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Hindi

एक बार फिर

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एक बार फिर, जहाँ मेरी यादें चरती हैं
उस पावन आँगन तक पहुँचने की चाह

उस आँगन के एक कोने में खड़े
उस आँवले के पेड़ को हिला देने की चाह
पेड़ को हिला देने की चाह

टूट-टूटकर जब फल बरसने लगें
दौड़कर उठा, एक चख लेने की चाह
वह सुखद कड़वाहट, वह खटास, वह मिठास
आज भी घूँट-घूँट पी लेने की चाह

बाड़ी के कुएँ से पानी खींचकर
पीकर कहने की — कितना मीठा! — चाह
कितना मीठा है, यह कहने की चाह

एक बार फिर उस नदी के किनारे
बस यूँ ही बैठे रहने की चाह

यूँ ही बैठे-बैठे किसी कोयल का
गीत सुन, बदले में गीत गाने की चाह

उसे सुनकर ऊँचे स्वर में कूकती कोयल के
सुर के पीछे-पीछे चलने की चाह
और अंत में रूठकर उड़ चले उस पंछी से
"न जा" — इतना कह पाने की चाह

जानता हूँ, ये सब चाहें व्यर्थ हैं, फिर भी
यूँ ही व्यर्थ चाहते रहने की चाह

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